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भारत की श्रेष्ठता भारत की कला

भारत की श्रेष्ठता भारत की कला में है:-प्रो.प्रत्युष



अखिल भारतीय साहित्य परिषद, काशी प्रान्त द्वारा आयोजित 'एक भारत श्रेष्ठ भारत' विषयक बेबनार को संबोधित करते हुए अखिल भारतीय साहित्य परिषद, गोरक्षप्रान्त के महामंत्री एवं आचार्य हिन्दी विभाग,गोरखपुर विश्वविद्यालय गोरखपुर प्रो प्रत्यूष दुबे ने कहा कि भारत की श्रेष्ठता भारत की कला,साहित्य और संस्कृति में है।कला हमारे जीवन के विविध रूपों का निर्माण करती है, रूप में सौंदर्य भरना कला का कार्य है।रूप को हम ज्ञान,चेतना से जितना परिष्कृत करेंगे हमारी संस्कृति उतनी ही सुदृढ़ होगी।
कला जीवन को सौंदर्य प्रदान करती है और कलात्मक रूप का नाम ही संस्कृति है।यह संस्कृति ही हमारी एकता के मूल में है।अनेकता में एकता ही हमारा सौंदर्य है।
प्रो दुबे ने कहा कि हमारी परम्परा हमारी संस्कृति का परिचायक है।आज कोरोना संकट के समय में हमें आवश्यकता है कि हम अपनी प्राचीन संस्कृति को आत्मसात करें,हमे पुनः उस भारत को याद करना है जो विश्वगुरू रहा है या जिसे सोने की चिड़िया कहा जाता था।हम अपनी संस्कृति को ग्रहण कर पुनः विश्वगुरू या सोने की चिड़िया बन सकते है।
डॉ दुबे नेअपने व्याख्यान में राष्ट्र को परिभाषित करते हुए कहा कि कोई भी भू भाग राष्ट्र नहीं बनता बल्कि राष्ट्र तब बनता है जब उस भू भाग में रहने वाला समाज उस भू भाग के प्रति मातृभूमि के समान पूज्य भाव रखता हो। भारत एक विशाल संस्कृति सम्पन्न राष्ट्र है,हमारी विविधता ही हमारा सौंदर्य है।समुद्र से उत्तर और हिमालय से दक्षिण जो भू भाग है,भारत है और हम भारत की संतान है।"माता भूमि पुत्रों अहं पृथ्वयाः"अर्थात यह पृथ्वी हमारी माँ है और हम सब इस पृथ्वी के पुत्र है।
डॉ दुबे ने आगे कहा कि राष्ट्र एक जीवन मान अस्तित्व है।राष्ट्र में रहने वाले लोग ऐसे होने चाहिए जिनकी एक विशिष्ट जीवन पद्धति हो।विशिष्ट जीवन पद्धति का अर्थ भारत तेरे टुकड़े होंगे कहने वाले लोगों से नही बल्कि सत्य,धर्म पर चलने वाले सदाचारी लोगों से है।
"जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी"अर्थात जन्मभूमि को जननी और स्वर्ग से भी बढ़कर मानने वाले लोग ही राष्ट्र की परिकल्पना पर खरे उतरते हैं।एक भारत श्रेष्ठ भारत के निर्माण में टुकड़े टुकड़े मानसिकता नही बल्कि वसुधैव कुटुम्बकम की मानसिकता अपेक्षित है।
जो संस्कृति हमारी एकता के मूल में है वही हमारी श्रेष्ठता का मूल भी है।समन्वय हमारी एकता का आधार है यह समन्वय हमारे साहित्य,समाज,अध्यात्म और हर जगह है।
प्रो दूबे ने कहा कि एक भारत श्रेष्ठ भारत की संस्कृति का मूल मंत्र त्याग है।यह त्याग भोगपूर्ण होना चाहिए-"तेन त्यक्तेन भुंजीथा" हम भोग करे किन्तु त्यागपूर्ण भोग करें।हमारा भोग त्यागपूर्ण होना चाहिए न कि विलासितापूर्ण।कबीर की अमर पंक्ति-'साई इतना दीजिए, जामें कुटुंब समाय। मैं भी भूखा न रहूँ, साधु न भूखा जाय।' हमारी त्यागपूर्ण संस्कृति का ही परिचायक है।
                         प्रो०प्रत्यूष दुबे
  आचार्य,हिन्दी विभाग-गो.वि.वि
  महामंत्री, गोरक्षप्रान्त,गोरखपुर

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