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वर्तमान परिवेश में नारी के बढ़ते कदम और कसती बेड़ियां-रीना त्रिपाठी

वर्तमान परिवेश में नारी के बढ़ते कदम और कसती बेड़ियां-रीना त्रिपाठी

आज समाज कितना प्रगति कर रहा है समंदर की गहरी खाइ को नापती पनडुब्बिया हो या दूर आसमान में स्थापित अंतरिक्ष स्टेशन सभी में महिलाओं का वर्चस्व है। किसी देश की राष्ट्रपति हो या किसी गांव की प्रधान, देश या विदेश के प्रशासनिक अधिकारी हो या दूर-दराज के गांव में कार्यरत प्राइमरी की शिक्षिका सभी जगह महिलाएं अपना वर्चस्व स्थापित कर रही हैं।
               फिर क्यों हर कदम कदम पर महिलाओं को उत्कृष्ट होने की समाज की अच्छाइयों और बुराइयों के प्रति संवेदनशील होने की खुद की गरिमा और प्रतिष्ठा को स्थापित करते हुए अपने ही समाज के लोगों से उसकी रक्षा करने की जरूरत पड़ती है।
                 मैं बचपन से देखती थी छोटी बच्ची अपनी शिक्षा को लेकर कितनी संवेदनशील होती थी भारत जैसे विविधता पूर्ण देश में यह आवश्यक नहीं कि हर घर में इतनी सुविधाएं हो कि वह अपने बच्चों को पढ़ा सकते हैं हर घर में इतनी स्वतंत्रता हो कि वह अपनी बच्चियों को निर्भीकता पूर्वक स्कूल में भेज सकते हैं, हर घर की इतनी स्वतंत्र मानसिकता हो कि वह अपनी बेटियों को पढ़ाने की मंशा भी रखते हो ....           

                 यह सब समस्यात्मक है ,क्योंकि आज भी हमारा समाज महिला को उपभोक्तावादी वस्तु ही समझता है,समाज में महिलाएं आज भी दूसरे के घर की संपत्ति ही समझी जाती है, मायके में कहा जाता है यह तुम्हारा घर नहीं ससुराल में कहा जाता है यह तुम्हारा घर नहीं......।        
               आज भी मध्यम वर्ग या कहे निम्न मध्यम वर्ग में यह शिक्षा दी जाती है ज्यादा किसी से बात मत करना, ज्यादा तैयार मत हो, कोई अगर बात करें तो ज्यादा मुस्कुराना मत, जिधर लड़कों का झुंड खड़ा हो उधर से निकलना मत................ इत्यादि इत्यादि।
मुझे आज भी वह बचपन याद है जहां कक्षा 6 और 8 में पढ़ने वाले कई साथी शादी के बंधन में बांध दिए गए, हाई स्कूल आते आते यह स्थिति हो जाती थी कि अब आगे नहीं पढ़ पाएंगे क्योंकि शादी कर देंगे , बहुत सी बच्चियां फुटबॉल, बास्केटबॉल और तैराकी की अन्य खेलों की महारथी होने के बावजूद आगे नहीं खेल पाती क्योंकि शायद हमारे समाज की मजबूरी है, किस कदम पर तरक्की के नाम पर उन्हें शोषित कर दिया जाए इसलिए यही सुरक्षित है कि उन्हें उनके घर तक सुरक्षित पहुंचा दिया जाए।
    चलिए अच्छा भी है माना समाज बड़ा दूषित हो गया है लड़कियों के प्रति सुरक्षात्मक दृष्टिकोण यही है😌 क्यों कोई बवाल हो ,क्यों किसी बच्ची को नौकरी के नाम पर उन्नाव के सिंगर जैसे लोग मिले और पूरा परिवार मिटा दिया जाए। 
             फिर भी संघर्ष करती बच्चीयाँ जो पहले तो बिना चाहे घर में आ गई थी, बिना चाहे जन्म ले लिया , बिना चाहे पढ़ाई भी कर ली ,बिना चाहे नौकरी भी मिल गई........ हां यह बात अलग है कि आज के आधुनिक परिवेश में नई पीढ़ी के परिवार बेटियां होने पर भी उत्सव मना रहे हैं, पर ज्यादा दिन नहीं दूसरी संतान उन्हें बेटा ही चाहिए।
             खैर यह तो रही हमारे अपने और हमारी समाज की एक छोटी सी झलक ,परंतु क्या वास्तविकता इन सब से परे हैं क्या वास्तव में हम अपनी बहन बेटियों को सम्मान दे पा रहे हैं ।क्या वास्तव में समाज में जन्म लेते ही कूड़े में हमारी बेटियां नहीं फेंक दी जाती, क्या वास्तव में पहली संतान सिर्फ बेटा ही पैदा हो ऐसा हर परिवार इच्छा नहीं रहती, आधुनिकता की दौड़ में दौड़ते हम क्या कभी इन सब मापदंडों को बदल पाएंगे।
        जिन बच्चियों ने अपने जीवन के संघर्ष के साथ पढ़ लिया ,जिन्होंने स्वाभिमान के साथ सर उठाकर रखने तथा खुद की आवश्यकताओं के लिए किसी के सामने हाथ ना पसारने का संकल्प लिया वह कहीं ना कहीं आज नौकरी भी कर रही हैं ।कुछ का साथ उनके परिवार ने दिया तो कुछ के परिवारों ने नहीं भी दिया परंतु संघर्ष की इस दहलीज पर खड़ी यह सब बेटियां क्या वाकई गरिमा पूर्ण जीवन जीने के लिए स्वतंत्र हैं।
            हां शायद उन महिलाओं से ज्यादा संघर्ष करती होंगी जो सिर्फ घर में अपने पिता, पति और पुत्र के आश्रित होंगी। पर ही सम्मान और अन्य सभी बंधनों से निजात पाने की समस्या तो वह बेटी और बहने जो घर की दहलीज के अंदर मां, बहन, बेटी , पत्नीऔर दहलीज के बाहर नौकर,कर्मचारी ,अधिकारी वैज्ञानिक ,डॉक्टर तथा विभिन्न प्रकार की उन सभी भूमिकाओं का निर्वाह करती हैं जो समाज के लिए आवश्यक है पर मापदंड  नहीं बदले उसे इन दोहरी भूमिकाओं का सहर्ष और दृढ़ता पूर्वक निर्वहन करना पड़ता है।
    जिन परिवारों ने अपनी बहन बेटियों को इतना आगे बढ़ाया क्या वह आज भी इस बात से आश्वस्त करते हैं कि उनकी बहन बेटी  सासम्मान अपने कार्यस्थल में काम करके वापस आएगी और उसे किसी भी प्रकार की अनहोनी, किसी भी प्रकार के अपमान किसी भी प्रकार की अमर्यादित टिप्पणीओं का सामना नहीं करना पड़ेगा, निश्चित रूप से मुझे लगता है कि हर उस परिवार के मुखिया को अपनी बहन और बेटियों की चिंता आज भी उतनी ही होती होगी जितनी शायद बचपन में।
           हमें आजाद हुए कितने ही वर्ष हो गए हैं पर क्या यह समाज जो हमारे ही परिवारों से मिलकर बना है ,क्या हमने नारी के प्रति अपनी मानसिकता में सुधार किया है। क्या हमने परतंत्रता की बेड़ियों से अपनी बहन और बेटियों को आज भी आजाद किया है क्या हम उनके लिए आज भी सम्मान की भावना रख पाते हैं... इतने सारे प्रश्नों के उत्तर में निश्चित रूप से आप कहेंगे क्यों नहीं यह सम्मान ही है कि हमने अपनी बहन बेटियों को समुद्र की गहराई से अंतरिक्ष की ऊंचाई तक पहुंचाया है.…....
             एक महिला होने के नाते मैंने कई बार हर उस प्रसिद्ध महिला के पीछे कई ऐसी कहानियां सुनी है जो शायद मंघड़ंत होगी, जो शायद कहीं न कहीं उसकी छवि को धूमिल करने के लिए बनाई जा रही होंगी निश्चित रूप से आपने भी कभी न कभी सुनी होगी🙏 पर क्या यह हमारे समाज की लगाई हुई वह बेड़िया नहीं जिन्हें हमारी बेटियां हमारी बहू अभी तोड़ नहीं सकती।
       आज भी अगर कोई महिला कुछ अलग करना चाहती है तो क्या उसे कार्यस्थल में टिप्पणियों, संघर्षों और और स्वयं को सिद्ध करने के क्रम में आलोचनाओं का सामना नहीं करना पड़ता।   
           क्यों भारतीय राजनीति में महिलाओं को अगर उनका खुद का संघर्ष उनके परिवारिक पृष्ठभूमि को छोड़ दिया जाए तो जमीनी स्तर पर सम्मान पूर्ण स्थान प्राप्त नहीं हो रहा, राजनीति में विस्तार पूर्वक पहले पुरुष उन्हें कुछ अजीब निगाहों से ही देखते हैं। आज भी संसद ,विधानसभा हो या अन्य राजनीतिक उपक्रम क्या हमें महिलाएं  आत्मसम्मान से भरी हुई और गरिमा पूर्ण कुछ एक चेहरों को छोड़ दिया जाए तो दिखाई पड़ती हैं ।आज भी हम यह क्यों कहते हैं कि राजनीति महिलाओं के लिए नहीं वह घर गृहस्ती देखें अपना परिवार देखें और खुश रहें.......
       क्या समय के साथ महिलाओं की दिशा और दशा भी बदलनी नहीं चाहिए अगर परिवार के साथ कोई मुसीबत आ जाए, किसी काम से ही सही तो क्या हम अपनी बहन बेटियों को रात में 12:00 बजे बेटों के समान ही मेडिकल स्टोर भेज सकते हैं, निश्चित रूप से नहीं क्योंकि आज भी हमारे परिवार से बने हुए समाज में कहीं ना कहीं कुछ कमी तो है ही भक्षक के रूप में  वस्तु के रूप में आज भी हमारी 4 साल की बेटी हो यह 100 साल की महिला उठा ली जाती है, शोषित की जाती है, मसली जाती है और मिटा दी जाती हैऔर हम ही कहते हैं कि स्वतंत्रता और स्वच्छंदता में अंतर हैं, सीमा और नियम तोड़े ही क्यों।
                 *क्यों हम उसे लड़की, महिला ,औरत के सिवा एक इंसान के रूप में नहीं देख पाए* क्यों हम और हमारा समाज बार-बार कहता रहा कि हम बहन, बेटी, मां के रूप में अपनी समाज की आधी आबादी को सुरक्षा सम्मान और गरिमा नहीं दे पाए और महिलाएं आज भी दोयम दर्जे का स्थान ही पा रही हैं।
            यदि समाज आपने हमने और हमारे परिवारों ने बनाया है तो फिर कमी कहां रह जा रही है ..क्या इस विषय पर सोचने समझने और मंथन करने की आवश्यकता नहीं है??
कानूनी रूप से भारत के संविधान में हम भारत के लोग भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न , समाजवादी, पंथनिरपेक्ष,लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा यहां के सभी नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक ,राजनीतिक न्याय,
विचार ,अभिव्यक्ति ,विश्वास ,धर्म और उपासना की स्वतंत्रता प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए तथा इन सब में *व्यक्ति की गरिमा* और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए संविधान को बनाते हैं। ऐसा लिख तो दिया गया पर क्या उस समय संविधान बनाने वालों को यह नहीं पता था कि संविधान में व्यक्ति की परिभाषा में महिला को नहीं रखा जाता और यदि रखा जाता था तो आज भी देश और संविधान महिलाओं को न्याय ,स्वतंत्रता, समता और गरिमा आज तक क्यों नहीं दे पाया क्यों आज ही एक महिला के साथ  यदि अन्याय होता है उसका समाज में व्याप्त भेड़ियों के द्वारा शोषण होता है तो उसे ही जलालत अपमान और न्याय के लिए अपने परिवार की बलि देनी पड़ती है और हम  समाज के पुरोधा इसे सिर्फ खबरों की तरह देखते सुनते और भूल जाते हैं।
                वाकई घर की दहलीज के अंदर हो, कार्यालय में हो , इतना समय बीत जाने के बाद भी समाज महिलाओं को गरिमा पूर्ण जीवन जीने की स्वतंत्रता नहीं दे पा रहे हैं ।अक्सर हम उन्हें कार्यस्थल में शोषित करने से लेकर कभी दहेज के नाम पर जलाने कभी बेटियां होने पर अपमानित करने, तो कभी महिला होने पर राजनीति में न जाने की सलाह देते हैंऔर महिला आयोग बनाकर उन्हें न्याय दिलाने का आश्वासन देते हैं।
         आज फैमिली कोर्ट में अलगाव के सबसे ज्यादा मामले हो रहे हैं और उसमें नुकसान भी बेटियों को हो रहा है पर शायद हमारा समाज दोषी भी उन्हें ही ठहरा रहा है।
 *क्या वास्तव में हम महिलाएं समाज की सोच को भी बदल पाएगा??????* 
आपके पास भी समय मिले तो सोचे क्या महिलाएं स्वयं अपनी दशा और दिशा निर्धारित करने अपने गरिमा अपने सम्मान की रक्षा के लिए अपने हक और अधिकारों के लिए बंधनों की बेड़ियों को खोल पाएंगी। 

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